आत्महत्या!

राकेश कुमार झा
वरिष्ठ पत्रकार

आत्महत्या , शब्द इतना भयाभव और डरावना है जिसको सुनकर ही किसी इंसान की रूह कांप जाती है , फिर भी आए दिन दुनिया में अनेकों आत्महत्या की घटनाएं या कहे की प्रक्रियाएं घटित होती रहती हैं। यूं तो गरीबी और जहालत इसके पीछे मुख्य कारण बताए जाते हैं ,किन्तु सुशांत सिंह राजपूत जैसे समृद्ध लोग जब इस कृत्य या कुकृत्य को अंजाम देते हैं तो फिर आत्महत्या के पीछे जिम्मेदार तथाकथित कारणों पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है, सोहरत, दौलत, सफलता और समृद्धि क्या नहीं था सुशांत जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी के पास। दुनिया की कोंसी चीज उसकी पहुंच से दूर थी ! इतनी कम उम्र में अभिनय की दुनिया में लोहा मनवाने वाले, करोड़ो लोगो के दिल में राज करने वाले, हसमुख स्वभाव के धनी सुशांत आखिरकार आत्महंता बनने को मजबूर क्यों हुए ?

यह प्रश्न ना केवल आत्महत्या के कारणों की पड़ताल करने की दृष्टि से अपितु विकाश के लिए गलाकात प्रतिष्पर्धा के दौर में भीड़ में अकेले भागते हुए कलपुर्जे रूपी इंसान की नियति को परखने के लिए भी यह समीचीन है।
सुशांत और इनके जैसे अनेक समृद्ध और सफल लोगो की आत्महत्या एक बात तो सिद्ध करती है कि व्यक्ति के जीवन में इस अर्थ पर केवल अर्थ ही एकमात्र ध्येय नहीं हो सकता जीवन का। हां यह महत्वपूर्ण है या हो सकता है, परंतु इसके इतर भी कुछ है जो जीवन में इसकी तुलना में कम मायने नहीं रखता। आखिरकार वह कुछ क्या है?

जिसके लिए व्यक्ति अपना अमूल्य जीवन तक अर्पित कर देता है, संभवतः वह कुछ शारीरिक और भौतिक आवश्यकताओं से परे वह पार्भोटिक या कहे की मानसिक और भावनात्मक वस्तु या भाव हो सकता है, जिसके लिए व्यक्ति अपने को या कहे कि जिसके बिना व्यक्ति अपने अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकता है और आत्मदाह तक कर लेता है.
यानी अर्थ से भी परे बहुत कुछ सार्थक है , पेट की भूख से भी परे कुछ भूख हैं या कहे कि आवश्यकताएं हैं जिसकी आपूर्ति मानव जीवन में अतीव आवश्यक है।
वह आवश्यकता किसी रिश्ते की हो सकती है। वह आवश्यकता प्रेम की हो सकती है ऐसी अन्य कई भावनात्मक जरूरत की पूर्ति ही व्यक्ति के जीवन को पूर्ण बनाती है।धन द्वारा तन की आवश्यकता पूर्ण हो सकती है किन्तु व्यक्ति मन से भी संचालित होता है , भावनाओ का भी अहम योगदान होता है जीवन में , जो कि तन की आवश्यकता से किसी मायने में कम अहम नहीं है , किन्तु दुनिया को ये चीजे दिखाई नहीं देती इनकी प्रकृति ही अगोचर है।

इन्हीं सब कशमकश में व्यक्ति स्वम को अकेला और हतभाग्य महसूस करता है , उसके लिए करोड़ो फॉलोअर्स की नहीं अपितु केवल एक सच्चे रिश्ते की जरूरत होती है , जो व्यक्ति को समझ सके , उसकी भावनाओ को महसूस कर सके , उसकी खुशी में इजाफा कर सके ,उसके दुख में द्रवित हो सके ,उसके बिना कहे वो उसके मन की बात जान सके। यदि इस तरह के एकनिष्ठ और प्रतिबद्ध निर्मल प्रेम की व्यक्ति के जीवन में प्राप्य हो तो व्यक्ति धन के अभाव और तन के कष्ट को सहन कर सकता है , किन्तु जब व्यक्ति भावनात्मक कमजोरी ,विषाद , संत्राश ,वेदना , अकेलापन , अजनबीपन , घुटन , आत्मनिर्वासन , अपूर्णता आदि मानसिक और भावनात्मक समस्यायों को महसूस करता है तब यहां अर्थ का कोई अर्थ नहीं होता। इनके लिए अर्थ से परे विशुद्ध निर्मल प्रेम और कोमल भावनात्मक सपोर्ट की आवश्यकता सार्थक नजर आती है.

किन्तु आज के भौतिकतावादी दौर में हर कोई दौड़ रहा है , केवल दौड़ रहा है , पता नहीं किसकी तलाश में ! इसलिए किसी के पास किसी के लिए लेस मात्र भी समय नहीं है , फेस बुक पर लाखों मित्र हैं पर घर में भाई भाई में बोलचाल बन्द है , फेसबुक पर हालचान पूछने वाले सामने आने पर बात तक नहीं करते ।
मानवीय संवेदना सुन्यता के कगार पर पहुंच गई है , पारिवारिक रिश्ते केवल भौतिक आवश्यकताओं की चारदीवारी तक सिमट के रह गए हैं , मां के गले भी बेटा/बेटी केवल सेल्फी लेने के लिए लगते है , पिता से बात केवल पैसे मांगने तक सीमित रह गई हैं। बच्चों को जन्म लेते ही घर से दूर ,शिक्षा की दुकानों में उनके वजन से ज्यादा भारी पुस्तकों के साथ ,भेजा जा रहा है।

उन्हें बचपन से ही दूसरों को पीछे छोड़ कर प्रथम आने का पाठ पढ़ाया जा रहा है, उन्हें सिर्फ एक ही सवाल पूछा जाता है कि तुमने कितने मार्क्स प्राप्त किए ! बच्चों का जीवन अंक तालिका का पर्यायवाची बन गया है, युवाओं का जीवन 5 इंच की दुनिया में सिमट के रह गया है l वृद्ध माता पिता का जीवन भूतकाल के स्वप्न, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य के सर्वनाश तक सीमित रह गया है।
इन्हीं परिस्थितियों में मकानों की संख्या बढ़ती जा रही है किंतु घर टूटते जा रहे हैं, वर्तमान दौर में बच्चे मानव की बजाए मशीन बनने की ओर अग्रसर किए जा रहे हैं, अब वे दादी और नानी के द्वारा कहानियां सुनकर बड़े नहीं हो रहे, अब वे 5 inch की दुनिया में पब्जी और अन्य हिंसक गेम खेलकर और अन्य अनेक हिंसक चल चित्र देख कर बड़े हो रहे हैं.

यह स्थिति निम्न और मध्यमवर्ग के साथ जितनी भया भव है उससे कहीं और कई गुना ज्यादा सुशांत राजपूत जैसे वर्ग में मौजूद है। औद्योगिकरण, शहरीकरण आदि नूतन क्रांतियों ने व्यक्ति को बहुत कुछ दिया विशेषकर उदर पूर्ति के लिए नए साधन मुहैया कराए, और जीवन को सुखी बनाने के लिए कई उपादान जुटाए, परंतु मनुष्य मात्र मशीन नहीं है जो केवल तेल रूपी भोजन से संतुष्ट हो जाए। उसके अंदर संवेदनाएं, भावनाएं भी होती हैं।
परंतु इस औद्योगीकरण ,शहरीकरण, वैश्वीकरण आदि से उत्पादित गला काट प्रतिस्पर्धा ने सर्वाधिक कुठार घात मनुष्य के भावों और संवेदना पर किया है। उसे मशीन बनाने के लिए पूरे उपादान जुटाए हैं, व्यक्ति एक छोर पर पेट की खातिर मशीन और दूसरे छोर पर भावों की खातिर मनुष्य के मध्य पेंडुलम की भांति दोलायमान है।
विपन्न भारत की अधिकांश आत्महत्या पेट की खातिर और संपन्न भारत की अधिकांश आवश्यकताएं मानसिक और भावनात्मक ( अकेलापन , विषाद , संत्रास ईटीसी) संबल के अभाव में घटित होती हैं ।
कोई भी व्यक्ति आत्महत्या एक दिन या एक क्षण में ही नहीं करता, इससे पहले वह कितने दिनों तिल तिल मरता होगा, कितने दिनों तक खुद से लड़ता होगा, परिस्थितियों से संवाद करता होगा, खुद को जीने की दिलासा देता होगा, किंतु जब वह इस संघर्ष में खुद को पराजित महसूस करता है, तब जाकर अपने अनमोल जीवन को हमेशा के लिए समाप्त करता है .

संभव है कि सुशांत राजपूत भी इन्हीं सब परिस्थितियों से जुझा हो , उसके चेहरे की मुस्कुराहट उसके गम छुपाने के लिए हो ( मंद मंद जो तुम मुस्कुरा रहे हो, क्या गम है जो तुम छुपा रहे हो) ।
उसकी आलीशान दुनिया उसके शरीर को सुख तो पहुंचा सकते थे परंतु संभव है कि उसको खुशी देने वाला कोई सच्चा रिश्ता ना हो, उसको महसूस करने वाला, सुनने वाला और समझने वाला या वाली कोई मनुष्य शायद होता तो शायद वह अपनी संवेदना व्यक्त करके खुद को हल्का महसूस कर सकता था और आत्महत्या जैसे कृत्य को करने से बच सकता था।

आजकल मनुष्य भीड़ में अकेला है, भीड़ की केवल ध्वनि होती है आवाज नहीं, अतः आवश्यकता है कि व्यक्ति केवल और केवल सुख के पीछे ना दौड़ कर थोड़ी सी खुशी के लिए भी प्रयास करें, रिश्तो की कद्र करें, माता पिता और भाई बहन के लिए प्रेम और सौहार्द्र का संवर्धन करें। सभी परिवार जनों के लिए थोड़ा सा समय निकाले, उनके दुख दर्द सुने और समझे और महसूस करें। कोई भी अवसाद और तनाव हो तो आपस में भावनात्मक संबल और सकारात्मक प्रेरणा देने का प्रयास करें।
गाड़ी बंगला, गुलदस्ते और गिफ्ट से इतर प्रेम, श्रद्धा, सहानुभूति, सहयोग, संवेदना, भावना का आदान प्रदान करें। पर्वत नदी और झरने जैसे रमणीय स्थानों के लिए पर्यटन पर जाने से इतर अपने परिवारी जनों के लिए भी कुछ वक्त निकाले।

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