देव प्रभाकर शास्त्री (दद्दा जी) का प्रभावशाली जीवन, अंतिम यात्रा में उमड़े हज़ारों लोग

दद्दा जी पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में भर्ती थे जहाँ उनका कई दिनों से इलाज हो रहा था। उन्हें 8 मई को माइनर पैरालिसिस अटैक आने पर दिल्ली लाया गया था। डॉक्टरों से कोई उम्मीद न मिलने के बाद, उन्हें शनिवार को ही उन्हें एयर एंबुलेंस से जबलपुर होते हुए मध्य प्रदेश के कटनी स्थित आश्रम में लाया गया था। कटनी के दद्दाधाम कॉलोनी में देव प्रभाकर शास्त्री उर्फ़ दद्दा जी ने रविवार की रात करीब 8.30 बजे अपनी आखरी सांसें ली। दद्दा जी के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु कटनी के आश्रम पहुंचे जहाँ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। दद्दा जी के प्रमुख शिष्य अभिनेता आशुतोष राणा और बीजेपी विधायक संजय पाठक ने उनकी अर्थी को कन्धा देकर अपना शोक व्यक्त किया। विधायक अजय विश्नोई, लखन घनघोरिया और संजय पाठक समेत अन्य कई लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘दद्दाजी’ की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ करने की बात करते हुए अपना शोक व्यक्त किया। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ श्रद्धांजलि देते हुए बोले- ‘दद्दाजी’ का निधन अपूरणीय क्षति है।

दद्दा जी के जीवन के महान कार्य
दद्दा जी का जन्म अनंत चतुर्दशी के शुभ दिन 19 सितम्बर 1937 को हुआ था. दद्दा जी का जन्म मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के तहसील सिहोरा के ग्राम कूंडा में एक किसान परिवार में हुआ था. इनके पिता का नाम गिरधारी दत्त जी त्रिपाठी और माता का नाम ललिता देवी था.

दुर्भाग्य वश जब दद्दा जी ने आठ वर्ष की उम्र में ही अपने पिता गिरधारी दत्त जी को उनके अकस्मात निधन के चलते खो दिया था. उनकी मां ललिता देवी ने किसानी एवं शिष्य परिवारों में भिक्षाटन कर दद्दा जी का पालन-पोषण किया.

दद्दा जी की मध्य शिक्षा काशी (वाराणसी) के टेड़ीनीम संस्कृत विद्यालय में हुई एवं उच्च शिक्षा विरला संस्कृत महाविद्यालय काशी में व्याकरण शास्त्र में हुई। वहां दद्दा जी ने व्याकरण में शास्त्री की उपाधि प्राप्त करने का गौरव प्राप्त किया. अध्ययन के समय ही दद्दा जी को यतिचक्र चूड़ामणि धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी का सानिध्य प्राप्त हुआ और वे उनके शिष्य बन गए।

स्वामी करपात्री जी ने 11 सौ करोड़ पार्थिव लिंग निर्माण एवं रुद्राभिषेक यज्ञ करने का संकल्प लिया था. इसमें एक यज्ञ गंगा तट पर संपन्न भी हो चुका है. लेकिन स्वास्थ्य और अन्य कारणों से वो ये कार्य आगे पूर्ण नहीं कर सके. अपने गुरु का ये संकल्प संपन्न करने का कार्य दद्दा जी ने स्वयं करना शुरू किया।

काशी से उच्च शिक्षा प्राप्त कर दद्दा जी जिला मिर्जापुर, बरैनी के हनुमंत संस्कृत विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त हुए थे. बरैनी में 1 वर्ष रहने के बाद 1962 में वापिस अपने ग्राम कूंडा आकर दद्दा जी ने राष्ट्र एवं मानव कल्याणार्थ, देश प्रदेश के अनेक स्थलों में श्रीमदभागवत, शिव् पुराण, देवी पुराण कथाऐ, एवं अनेकों यज्ञ सम्पन्न कराए.

1962 से अभी तक दद्दा जी द्वारा 180 श्री मदभागवत कथाएं, एवं अनगिनत धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न कराए गए हैं. करपात्री जी के संकल्प को पूर्ण करने हेतु, दद्दा जी के द्वारा सवा करोड़ पार्थिव शिव लिंग का निर्माण महांयज्ञ नवम्बर 1980 में जबलपुर स्टेडियम से प्रारम्भ कर श्रृंखला को जारी रखते हुए संकल्प का 108 वां यज्ञ, बाबा महांकाल की पावन नगरी उज्जयिनी में मोक्ष दायिनी मां सलिला, पूण्य मां क्षिप्रा के पावन तट ऊजरखेड़ा में सिंहस्थ के पुनीत अवसर पर 3 से 9 मई 2016 तक संपन्न कराया. यह क्रम बढ़ते हुई अभी तक 132 सवा करोड़ पार्थिव शिव लिंग निर्माण, महारुद्र यज्ञ एवं रुद्राभिषेक सम्पन्न हो चुके हैं.

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