3 सांसद वाली पार्टी 72 साल बाद बन गई दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी, जानें जनसंघ के संघर्ष की कहानी
संघर्ष करने वालों की हार नहीं होती और जो आग में तपता है वो एक दिन जरूर चमकता है। ऐसा ही हाल बीजेपा का था जो अपने शुरूआती दौर में केवल कांग्रेस के लिए एक हंसी का पात्र से ज्यादा कुछ नहीं थी लेकिन समय ने ऐसी करवट बदली और कांग्रेस दुनिया के लिए आज हंसी पात्र बन गई। भारतीय जनता पार्टी का सफर भारतीय जनसंघ से शुरू हुआ जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि उसने अपने सफर की शुरूआत केवल 3 सांसदों से की जो अब 300 पर पहुंच गई है। आज हम दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के उन नेताओं की बात करेंगे जो किसी पहचान के मोहताज नहीं है लेकिन इसके बाद भी उनके योगदान को याद नहीं किया जाता।
भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 को दिल्ली में हुई थी जबकि बीजेपी का गठन 6 अप्रैल 1980 को हुआ। बीजेपी आज बुलंद मुकाम पर है और देश के 70 प्रतिशत राज्यों में उसकी सरकार है।शून्य से शिखर तक पहुंचने की उसकी यात्रा लंबे संघर्ष से भरी हुई थी।
आइए डालते एक नजर बीजेपी के अर्श से फर्श तक की कहानी पर
जनसंघ की नीव डॉण् श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने रखी और उस समय कांग्रेस देश की सबसे बड़ी पार्टी थी। जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार में डॉण् श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे लेकिन विचारधारा की लड़ाई ने उनको अलग करने पर मजबूर कर दिया। 19 अप्रैल 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर कांग्रेस के सामने राजनीतिक दल खड़ा करने का प्रण लिया। मुखर्जी कांग्रेस की विचारधार से सहमत नहीं थे क्योंकि उस समय कांग्रेस का मुसलनमानों की तरफ ज्यादा झुकाव था।
जनसंघ का गठन नेहरू जी के दो फैसलों से हुआ जिसमें पहला था नेहरू.लियाकत समझौता और दूसरा महात्मा गांधी की हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बैन करना। उन्होंने सोचा देश की राजनीति में कांग्रेस का विकल्प होना भी जरूरी है और इसी प्रण ने उनको यह करने की हिम्मत दी। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा काम किया जो किसी ने नहीं सोचा था उन्होंने बिना परमिट जम्मू.कश्मीर की यात्रा शुरू कर दी तो केंद्र और राज्य सरकार की नींदे उड़ गई।
इस घटना से डरे शेख अब्दुल्ला सरकार ने गिरफ्तार किया और 40 दिन बाद खबर आई कि मुखर्जी का निधन हो गया है यह बहुत बड़ी घटना थी। इसके बाद 25 साल तक जनसंघ की ज्यादा हलचल नहीं रही लेकिन 1975 में उसको फिर से जनता के बीच आने का मौका मिला। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया तो जनसंघ ने खुलकर विरोध किया तो उनके सभी नेताओं को जेल में डाल दिया। इसके बाद चुनावों में कांग्रेस को पहली बार सत्ता से बेदखल करने के लिए विपक्षी दलों ने साथ आने का दाव खेला और जनता पार्टी बनाई।
मोरारजी देसाई की अगुवाई में जनता पार्टी की केंद्र में सरकार बनी और जनता पार्टी की सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने। लेकिन यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चली क्योंकि नेताओं की आपसी फूट से पार्टी दो धड़ों में बट गई। कांग्र्रेस ने फिर अपनी चाल चली और 1979 में जनता पार्टी की सरकार गिर गई तो लोकदल के नेता चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने।
जनसंघ के नेताओं ने आरएसएस की सदस्यता छोड़ने के मुद्दे पर अपनी सरकार की बली चढ़ा दी। लेकिन उन्होंने जनता पार्टी के नाम से नई पार्टी का ऐलान कर दिया। 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने 6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी के नाम से नई राजनीतिक पार्टी का ऐलान किया और कमल के फूल को अपना चिन्ह बनाया। इसके पीछे भी एक कारण था पहले यह हिंदू धर्म से जुडा था दूसरा राष्ट्रिय फूल था। इसके बाद उन्होंने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद दोनों का संदेश देते हुए कांग्रेस से टक्कर लेनी शुरू कर दी। लेकिन इसके बाद भी उनको ज्यादा फायदा नहीं मिला और 1984 में लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गए।
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इसके बाद बीजेपी ने राममंदिर मुद्दे को मुख्य राजनीतिक एजेंडे में रखा और अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल कर दिया। इसका फायदा 1989 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जबरदस्त तरीके से सियासी लाभ मिला, बीजेपी 2 सीटों से बढ़कर 85 पर पहुंच गई। 25 सितंबर 1990 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए राम रथ यात्रा शुरू कीं, इसके बाद वह घटना घटित हुई जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की सरकार ने आडवाणी को हिरासत में लिया तो यूपी के सीएम मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर फायरिंग करने का आदेश दे दिया। इसके बाद बीजेपी चुनावों में गई तो उसकी संख्या 120 पार हो गई लेकिन बाबरी विवाद के बाद तो बीजेपी को बड़ी सफलता मिनली शुरू हो गई।
इसके बाद पीएम मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने तो वह कर दिखाया जो सपना मुखर्जी ने 1952 में देखा था और कांग्रेस अपने इतिहास में पहली बार 50 सीटों पर सिमट कर रही गई और बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाई। इसके बार पीएम मोदी ने कांग्रेस को मुक्त करने का नारा दिया जो समय के साथ होता चला गया और मौजूदा हालात में कांग्रेस केवल 2 राज्यों में है और केंद्र में तो वह विपक्ष में बैठने के लायक भी नहीं बची। मोदी ने कहा जब हमारी पार्टी के 2 सांसद विपक्ष में बैठते थे तो कांग्रेस के नेता हंसते थे और आज देश उन पर हंस रहा है।





