इस सेना के जवान की शौर्य और प्रेम कहानी पढ़कर आंखों से बहने लगेंगे आंसू
कारगिल युद्ध को 23 साल पूरे हो गए हैं। भारत के जांबाजों की वीरता की दास्तां आज भी हमारे जेहन में ताजा है। कारगिल विजय दिवस जब.जब मनाया जाएगा तब.तब अपने प्राणों की आहूति देने वाले वीर सपूतों को याद किया जाएगाए पाकिस्तानी घुसपैठियों पर कहर बनकर टूटे उन शहीदो को जब भी याद किया जाता है आंखे नम और सीना गर्व से चौड़ा हो जाता हैए उनहीं वीर शहीदों में एक नाम है शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा काए जिनके सच्चे प्यार और उनकी प्रेमिका के बलिदान की कहानी एक मिसाल है जो आज के दौर में मिलनी मुश्किल है।
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कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबरए 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। 1997 में जम्मू.कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर विक्रम बत्रा की ज्वाइनिंग हुई और जूनए 1999 में उन्हें कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प और रॉकी नाब को जीतने के बाद विक्रम बत्रा को लेफ्टिनेंट से कैप्टन बना दिया गया। पाकिस्तानी की सेना के कब्जे में कश्मीर की 5140 नंबर की चोटी होने पर उसे छुड़ाने के कैप्टन बत्रा को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। कैप्टन विक्रम बत्रा ने 19 जूनए 1999 को रात में इस चोटी को जीतने का प्लान बनाया और आधी रात में ही चढ़ाई शुरू कर दी गईए बत्रा ने अकेले ही लड़ाई में तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। 20 जून 1999 को सुबह साढ़े 3 बजे कैप्टन विक्रम बत्रा ने पाकिस्तानी सैनिकों को धूल चटाते हुए 5140 चोटी पर तिरंगा फहरा दिया। प्वांइट 5140 को जीतने के बाद विकम बत्रा ने प्वाइंट 4700ए जंक्शन पीक और थ्री पिंपल कॉम्प्लेक्स को भी जीत लिया। इस ऑपरेशन में किसी भारतीय सैनिक की जान नहीं गई।
चार चोटियों को जीतने के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को अगले प्वांइट 4875 को जीतने की जिम्मेदारी सौंपी गई। 4 जुलाई 1999 की शाम 6 बजे उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ प्वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्मन पर हमला शुरू किया। रात भर बिना रुके गोलीबारी चलती रहीए लेकिन यह चोटी अब तक फतेह नहीं हो पाई। कैप्टन बत्रा और उनकी टीम प्वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्मन के बंकरों पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर रही थी। इसी बीच बत्रा की टीम के दो सैनिक घायल हो गए। इस पर बत्रा उन्हें उठाकर नीचे ले जा रहे थे। इसी बीच पाकिस्तानी सैनिकों ने बत्रा को गोली मार दीए जिसके बाद कैप्टन अपने देश पर बलिदान हो गए। प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने के सम्मान में इस चोटी का नाम बत्रा टॉप रखा गया।
विक्रम बत्रा की प्रेम कहानी की अगर बात करें तो पंजाब यूनिवर्सिटी में इंग्लिश एमए की पढ़ाई के दौरान उनकी एक दोस्ती प्यार में बदली और आगे चलकर उन्होने शादी का फैसला लियाए विक्रम बत्रा ने अपने परिवार में कह दिया था कि वे शादी के लिए कोई और लड़की नहीं देखेंगे वो अपनी गर्लफ्रेंड से ही शादी करेंगे। परिवार को भी इसपर कोई ऐतराज नहीं था। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। कारगिल के युद्ध में 25 साल के विक्रम बत्रा शहीद हो गए।

जब विक्रम बत्रा का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ घर आया तो उनकी गर्लफ्रेंड उनकी शहादत के बाद अंतिम विदाई देने के लिए पालमपुर आईं। उन्होंने कहा था कि अब वे किसी से भी शादी नहीं करेंगी। उस वक्त उनकी उम्र 22 साल की थी। उन्होंने पूरी जिंदगी अकेले गुजारने का फैसला किया। विक्रम बत्रा की जिंदगी पर बनाई गई फिल्म शेरशाह में अभिनेता सिध्दार्थ मल्होत्रा ने विक्रम बत्रा के किरदार को बखूबी निभाया है।

