मुख्य समाचार पर जाएं
हिंदी समाचार · नवतेज टीवी
राजस्थान न्यूज़जयपुर की खबरसीकर समाचारआज राजस्थान में क्या हुआ?कोटा की खबर
नवतेज टीवी
☰ समाचार श्रेणियां
देश विदेश

मौज-मस्ती की उम्र में फांसी पर चढ़ गए आजादी के 3 दिवाने, आज युवाओं के लिए बने रोल मॉडल

प्रकाशित: Mar 23, 2023 05:40रिपोर्ट: Navtej TV

23 मार्च सन 1931..यूं तो आजादी के परवानों की शहादत की तारीख को कौन नही जानता....लेकिन शायद लोग ये नही जानते की शहादत के सपने बुनने में जिंदगी को बेगाना करना पडता है....तारीखें पुरानी हो जाती है लेकिन शहादत हर वक्त झकझोरती है...झिंझोडती है और कहती है..अब तुम्हारें हवाले वतन साथियों....

बरतानिया हुकुमत का डर भगतसिंह राजगुरु और सुखदेव को लेकर कितना बडा था ,इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुकर्रर तारीख से पहले ही शाम 7 बजकर 33 मिनट पर तीनों को फांसी दे दी गई....वो दौर सिर्फ जुल्म का था...वहां न्याय और फैसले सिर्फ इग्लैण्ड के झण्डे की सहूलियत के हिसाब से हुआ करते है...ना कैदियों के अधिकारों की चिंता और ना ही वैश्विक मापदंडो की परवाह...बस बिरतानिया हुकुमत के खिलाफ जो भी गया उसे बंदी बनाकर दुनिया से विदा कर दिया गया.... 24 मार्च 1931 को

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी जानी थी और भगत इस फैसले से खुश नहीं थे.... उन्होंने 20 मार्च 1931 को पंजाब के गवर्नर को एक खत लिखा कि उनके साथ युद्धबंदी जैसा सलूक किया जाए और फांसी की जगह उन्हें गोली से उड़ा दिया जाए...22 मार्च 1931 को अपने क्रांतिकारी साथियों को लिखे आखिरी खत में भगत ने कहा-

''जीने की इच्छा मुझमें भी है, ये मैं छिपाना नहीं चाहता। मेरे दिल में फांसी से बचने का लालच कभी नहीं आया। मुझे बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। और आखिर हुआ भी वही जिसका डर था...फांसी के लिए तय वक्त से 12 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर भगत, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई। इस घटना को आज 92 साल पूरे हो चुके है..

कहानी शुरू होती है जब चौरी-चौरा के बाद 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इससे नाराज होकर भगत, चंद्रशेखर और बिस्मिल जैसे हजारों युवाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियारबंद क्रांति का रुख कर लिया था...और अंग्रेजो के खिलाफ जंग की शुरुआत कर दी..30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में निकाले गए जुलुस पर हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपतराय का निधन हो गया और उसी के साथ शुरु हो गया अग्रेज अफसरों से बदला लेने का जुनुन..भगत, सुखदेव और राजगुरु ने लालाजी की हत्या का बदला लेने की कसम खाई और स्कॉट की हत्या का प्लान बनाया।

ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर 1928 को तीनों प्लान के तहत लाहौर के पुलिस हेडक्वार्टर के बाहर पहुंच गए। लेकिन गलतफहमी में भगत और राजगुरु नें स्कॉट की जगह सांडर्स को ढेर कर दिया। और तभी से ये ब्रिटीश हुकुमत की निगाह की किरकिरी बन गए..लेकिन पूरी ताकत झौंकने के बाद भी ब्रिटीश हुकुमत भगत को गिरफ्तार नही कर पाई और भगत ने अपने साथियों के साथ सेंट्रल एसेंबली ब्लास्ट में गिरफ्तारी दी ताकि लोगो में आजादी की अलख जगाई जा सके..सांडर्स केस में हुई फांसी की सजा के बाद भी भगत, राजगुरु और सुखदेव ने कभी ब्रिटीश हुकुमत के आगे माफी की गुहार तक नही लगाई..बल्कि तब तक हुकुमत को परेशान ऱखा जब तक जिस्म में प्राण रहे..और शायद इसी शहादत की बदौलत, 16 साल बाद यानी 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश हुकूमत को हमेशा के लिए भारत छोड़कर जाना पड़ा।