विजयादशमी का पर्व असत्य पर सत्य की जीत का संदेश देने के साथ जीवन में नए संकल्प लेने का अवसर बनता है। इस खास दिन पर शस्त्र पूजन के साथ देवी अपराजिता की आराधना और शमी के पौधे के दर्शन करने की पुरानी परंपरा चली आ रही है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दशहरे के दिन शमी के पौधे की पूजा करने से व्यक्ति को हर कार्य में सफलता मिलती है और जीवन की मुश्किलें कम होती हैं। इस पौधे को सुख-समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना गया है।
पूजा का सही तरीका क्या है?
दशहरे के दिन सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें और अपने इष्टदेव के साथ परंपरा के अनुसार अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करें। इसके बाद शमी के पेड़ के पास जाकर पूरी श्रद्धा के साथ अनुष्ठान पूरा करें।
पूजा के दौरान शमी की जड़ के पास पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। पेड़ को जल, अक्षत और फूल अर्पित करने के बाद घर में सुख-शांति की प्रार्थना की जाती है। पूजा के बाद शमी के कुछ पत्तों को घर लाकर तिजोरी में रखने का विधान है। कुछ जगहों पर इन पत्तों के साथ पूजा की थोड़ी सी मिट्टी, चावल और सुपारी को एक कपड़े में बांधकर सुरक्षित रखा जाता है।
शनि और शिव से क्या है कनेक्शन?
ज्योतिष शास्त्र में शमी के पौधे का संबंध सीधे तौर पर शनिदेव से जोड़ा गया है। शनि की शांति के लिए शमी की लकड़ी से हवन करने और इसकी पूजा करने का नियम है।
धार्मिक कथाओं के अनुसार शनिदेव को भगवान शिव का शिष्य माना गया है। शमी के पत्ते भगवान शिव को अर्पित करने से शिव और शनि दोनों की एक साथ कृपा मिलती है और साधक को विशेष आशीष प्राप्त होता है।
देवी अपराजिता की आराधना का महत्व
दशहरे के दिन मां अपराजिता की पूजा का भी विशेष स्थान है। देवी अपराजिता को विजय दिलाने वाली शक्ति के रूप में पूजा जाता है।
परंपरा के अनुसार उनकी मूर्ति या प्रतीक स्थापित करके 'ॐ अपराजितायै नमः' मंत्र का जाप किया जाता है। इसके बाद देवी से कार्यों में सफलता, साहस और हर तरह की बाधाओं पर विजय पाने की प्रार्थना की जाती है।





