इस कारण 15 दिन तक नहीं खुलते भगवान जगन्नाथ के कपाट, जानें इसकी पूरी कहानी
हिन्दू धर्म में देवी देवताओं का बहुत सम्मान किया जाता है और आषाढ़ माह का महत्त्व तो देवताओं से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। इस माह में अगर भगवान विष्णु की सच्चे मन से पूजा-आराधना की जाए तो मन चाहे फल की प्राप्ती होती है। आषाढ़ में देवशयनी एकादशी का व्रत रखने का भी एक कारण है। वहीं दूसरी और ओडिशा में स्थित पूरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की एक प्राचीन कहानी जुड़ी हुई है।
प्राचीन परंपरा के अनुसार भगवन विष्णु का स्वरुप जगन्नाथ भगवान को माना जाता है। यहाँ भगवान अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ विराजमान है। पूरी में निकाली जाने वाली रथ यात्रा का अपना अलग ही महत्व है जिसको देखने के लिए लाखों श्रद्धालु देश विदेश से यहां आते हैं। आइये आपको बताते है इसके पीछे की कहानी
साल में एक बार भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बड़े भाई बलराम के साथ पूर्णिमा के दिन गर्भगृह से बहार आते है। इसके बाद इन तीनों को स्नान कराया जाता है। इसके बाद गर्भगृह में एक विशेष आरती के बाद मंदिर के कपाट 15 दिन के लिए बंद कर दिए जाते है। भगवान जगन्नाथ मंदिर के कपाट इस साल 4 जून से 18 जून तक बंद रखे जाएंगे और इस दौरान भक्तों को दर्शन भी नहीं कराए जाते हैं।
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15 दिन मंदिर के कपाट बंद करने का कारण यह है कि जब उनको स्नान कराया गया तो उन्हें तेज बुखार हो गया था। इसके बाद भगवान को 15 दिन तक शयन कक्ष में आराम करवाया गया था और उनका उपचार किया गया। इस मान्यता के आधार पर आज भी भगवान को 15 दिन के आराप के लिए अकेला छोड़ा जाता है।
हिन्दू धर्म की मान्यता है की पूर्णिमा के दिन भगवान का 108 घंटे स्नान करने के कारण उन्हें बुखार आ जाता है और भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जानते है, इसीलिए भगवान 15 दिनों तक अपने शयन कक्ष में आराम करते है। आम लोगो जैसा ही भगवान का उपचार किया जाता है।




