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सूबे की 2 बार सीएम रही महारानी का खत्म हो गया वजूद, पार्टी ने कर दिया साइडलाइन.. वापसी नहीं होगी आसान

प्रकाशित: Jun 15, 2023 15:28रिपोर्ट: Navtej TV

एक महारानी जिसके खून में राजनीति है. उबाल है और साथ ही विरोधियों की हर चाल का जवाब भी.बस नहीं है तो सिर्फ उनका समय..जिनके एक ईशारे पर सूबे की सियासत में भूचाल आ जाता हो. ब्यूरोक्रेसी में चर्चाओं का दौर शुरु हो जाता हो .वो आज राजनीत का अज्ञातवास काटने पर मजबूर है। हम बात कर रहे है सिंधिया राजघराने की बेटी और धौलपुर के जाट राजघराने की बहू और राजस्थान की 2 बार सीएम रही चुकी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अपनी बिंदास कार्यशैली से विरोधियों पर तीखे प्रहार करने वाली वसुंधरा राजे सिंधिया विधानसभा चुनाव से पहले फिर चर्चाओं में हैं..उनके विरोधी बार-बार यह बात करते हैं कि, राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा का ग्राफ उतर गया है,

लेकिन हर बार उनकी शख्सियत विरोधियों के हौसले पस्त कर देती है..पिछले दिसंबर में राजस्थान में विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा में किनारे कर दी गईं, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे राजनीतिक जंगल में वनवास काट रही है क्योकि पार्टी आलाकमान राज्य में नेताओं की एक नई पीढ़ी का पोषण करने के लिए उनसे परे दिखता है..राजस्थान बीजेपी में राजे अभी भी अकेली जन नेता हैं, लेकिन खुद को अलग-थलग पाती हैं.पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि राजे इस मोड़ पर एक बड़ी दुविधा का सामना कर रही हैं- या तो चुपचाप बैठी रहें और सही समय का इंतजार करें.लेकिन चुनावी मोड पर बैठी सूबे की सियासत में इंतजार कितना करना होगा ये अभी तक स्पष्ट नही हो पाया है.

ऐसे में सवाल खडा होता है की क्या बीजेपी, बिना महारानी के चुनाव वैतरणी पार करने की तैयारी में है या फिर केन्द्रीय आलाकमान अब राजे को राजस्थान से बाहर निकालने के फैसले पर पीछे हटने को तैयार नही है.दरअसल करीब राजे को राज्य से बाहर ले जाने की सियासत के तहत तकरीबन 4 साल पहले उन्हे सांत्वना के तौर पर बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का औपचारिक तमगा दिया गया था.यह कदम उन्हें राज्य की राजनीति से बाहर ले जाने के लिए ही उठाया गया था.कहा जाता है कि राजे को राजस्थान विधानसभा में 72 बीजेपी विधायकों में से 80 प्रतिशत विधायक और सूबे की 36 कौमों का समर्थन प्राप्त है।

लेकिन आज कोई भी उनके लिए बोलने को तैयार नहीं है....हालात ये है की सूबे की सियासत में वसुंधरा राजे, बीजेपी के लिए सिर्फ औपचारिक बनकर रह गई हैं..यहां सिर्फ महारानी ही नही उनके बेटे सांसद दुष्यंत सिंह भी सियासत का अज्ञातवास काट रहे है.झालावाड़ से चार बार सांसद रहे राजे के बेटे दुष्यंत सिंह को न तो केन्द्र सरकार में और ना ही पार्टी में कोई बडी भूमिका मिली है..ऐसे में नजरअंदाज करने की पराकाष्ठा अब मानों सारी हदें पार करने पर आमादा हो.
लेकिन पार्टी के अंदरखाने की बात करें तो भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "यह सर्वविदित है कि उनके मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ अच्छे संबंध नहीं थे।" “अतीत में, जब पार्टी गजेंद्र सिंह शेखावत को राज्य भाजपा अध्यक्ष बनाना चाहती थी, तो राजे ने इसका पुरजोर विरोध किया था और तब मदन लाल सैनी को सूबे की बीजेपी का प्रमुख बनाया गया..

नेता ने कहा, "भाजपा नेतृत्व को झुकना पड़ा, क्योंकि पार्टी राज्य में सत्ता में थी और इकाई को तोड़ने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहती थी।" "विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण के दौरान भी, अमित शाह और राजे एक ही पृष्ठ पर नहीं थे।" एक अन्य नेता ने कहा, "अगर भैरों सिंह शेखावत ने पार्टी का आधार बनाया, तो उन्होंने इसे मजबूत किया और यह सुनिश्चित किया कि जाटों के वोट बीजेपी को मिले,जो कुछ अनसुना था।" "उसके पास लड़ने की भावना है और वह लड़ाई जीतने के लिए कुछ भी करेगी। ऐसे में उन्हें इस समय बर्खास्त करना सही नहीं होगा। वह सत्ता से बाहर हो सकती है लेकिन फीनिक्स के रूप में फिर से उठ सकती है......जहां तक बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का सवाल है,

विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के तुरंत बाद, वे कथित तौर पर ऐसे बदलाव कर रहे हैं जो राजे की पार्टी पर पकड़ को कमजोर कर रहे हैं....और इसके तहत केन्द्रीय नेताओं को सही समय का इंतजार था और वो सही समय अब राजे राजस्थान दोनो के लिए घातक साबित हो रहा है..कहा जाता है की एक दौर में राजे को दिल्ली में लाल कृष्ण आडवाणी, स्वर्गीय अरुण जेटली और राजनाथ सिंह का समर्थन प्राप्त था..लेकिन कॉर्पोरेट कल्चर में ढली बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने समर्थकों को या तो मार्गदर्शक मंडल में शिफ्ट कर दिया गया है या फिर उन्हे पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है.

ऐसे में राजे अपने अमूल्य सहयोगियों को खो चुकी है. चलिए अब आपको ये बताते है की राजे को साइडलाइन करने से राजस्थान की राजनीति का प्रभाव कैसे कम होता जा रहा है..जानकारों की मानें तो राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की दो बार सरकार बनाने और लोकसभा चुनाव में पार्टी का परचम सिर्फ और सिर्फ वसुंधरा राजे के कारण संभव हो सका है. कांग्रेस नेताओं के आपसी विवाद के बीच में सुर्खियों में आई वसुंधरा राजे ने कांग्रेस पर जबरदस्त प्रहार किया..उन्होंने कहा कि जितना अपमान सीएम गहलोत ने मेरा किया, उतना शायद किसी ने नहीं किया. ऐसे लोगों से मन मिल ही नहीं सकता..वसुंधरा राजे सिंधिया बीजेपी के नेताओं के मंसूबों को जिस चतुराई से विफल कर रहीं हैं, वह उन्हें 39 साल के सियासी अनुभव की पाठशाला से मिला है.ऐसे में उन्हे हलके में लेना सिर्फ मुसीबत के समय आंखे बंद कर लेना जैसा ही है।

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बहरहाल राजस्थान की राजनीति से वसुंधरा राजे के बाहर होने के बाद कही ना कही बीजेपी आम अवाम से अपनी पकड को लगातार खोती जा रही है राजे की गैरमौजूदगी से बीजेपी के जमीनी प्रयोग लगातार हवा हवाई साबित हो रहे है चाहे वो सतीश पूनिया का दौर या फिर सीपी जोशी का आम अवाम आज भी उस आवाज को सूनने के लिए बेताब है जो अक्सर राजनीतिक मंचों से कही जाती है की मैं आपकी बहू हूं और आपके साथ खडी हूं. लेकिन उस गूंज को बीजेपी के शीर्ष नेता नजर अंदाज कर रहे है.जिसका खामियाजा आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को भुगतना पड सकता है।

राकेश कुमार शर्मा