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जाट वोटर के सहारे सत्ता पाने की नई योजना, आंदोलन से दिखाई अपनी ताकत

प्रकाशित: Jun 16, 2023 17:41रिपोर्ट: Navtej TV

जातिगत आंदोलनों ने देश की दिशा और दशा दोनों समय-समय बदली है.दिल्ली में चल रहा जाट पहलवानों का आन्दोलन अब जाट किसान आन्दोलन में बदल गया है। जाट किसान और जाट पहलवान दोनों ने मिलकर चुनावी राजनीति शुरू कर दी है। कभी पहलवानों के नाम पर झंडा उठाया जा रहा है, तो कभी किसानों के नाम पर..अभी हाल ही में पहलवानों का मामला थोड़ा ही ठंडा पड़ा, तो हरियाणा में सूरजमुखी की एमएसपी का मुद्दा चर्चा में आ गया..हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने सूरजमुखी की एमएसपी का मुद्दा हल किया तो अगले दिन ही पहलवानों के मुद्दे पर हरियाणा बंद का एलान हो गया..असल में यह राजस्थान के चुनाव की टूल किट है.

रजस्थान के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, तो जाटों का फोकस हरियाणा से राजस्थान की ओर शिफ्ट होने वाला है..जाटों की सब से बड़ी पीड़ा यह है कि राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनका अच्छा खासा वोट बैंक होने के बावजूद वे राजनीतिक सत्ता से पूरी तरह बाहर हो गए हैं.हरियाणा राज्य में 31 प्रतिशत जाट आबादी होने के बावजूद पिछले दो चुनावों में मुख्यमंत्री की कुर्सी जाटों से छिन गई....बाकी सियासत ने सत्ता से जाटों का दबदबा खत्म कर दिया है.अगर हरियाणा में जाट सीएम की बात करें तो कांग्रेस ने हरियाणा में लगभग हमेशा ही जाट मुख्यमंत्री बनाया.कांग्रेस से मुख्यमंत्री बने भजन लाल भी बिश्नोई थे, जो जाटों के समान उपजाति रखते हैं। जिसकी प्रतिक्रिया दूसरी जातियों में हुई, अगर जाट मुख्यमंत्री दूसरी जातियों को साथ ले कर चलते तो आज ऐसी स्थिति नहीं होती

हरियाणा के बाद राजस्थान में 10 से 12 प्रतिशत जाट आबादी है, इसके अलावा 2 प्रतिशत बिश्नोई और जट्ट सिख मतदाता भी हैं..चूंकि राजस्थान में जाट आबादी का लगभग 50 विधानसभा सीटों पर अच्छा खासा प्रभाव है..तो राजस्थान विधानसभा के 200 सीटों में से सदन में 30 से 35 तक जाट विधायक जीत कर पहुंचते हैं, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस ने कभी जाट मुख्यमंत्री नहीं बनाया..इसकी वजह यह है कि अन्य किसी भी समुदाय के नेतृत्व को दूसरी जातियां स्वीकार तो कर लेती हैं, लेकिन जाट नेताओं को नहीं कर पातीं..राजस्थान में बेहद ही कम वोट प्रतिशत वाली माली जाति के अशोक गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री हैं. शिवचरण माथुर भी दो बार मुख्यमंत्री रहे, जबकि माथुर का भी जातीय आधार नगण्य ही था

राजस्थान में जाटों जितनी जनसंख्या वाले ब्राह्मण बिरादरी से तो आधा दर्जन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे. इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 17 प्रतिशत जाट, 2 प्रतिशत सिख और बिश्नोई वोटर होने के बावजूद भी चौधरी चरण सिंह को ही मुख्यमंत्री बनें वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह की पार्टी आरएलडी का आज भी अच्छा खासा प्रभाव है जिसके बदौलत यूपी विधानसभा में अच्छी खासी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं.दूसरी तरफ जाटों से कम संख्या कम होने के बावजूद राजपूत राजस्थान में सीएम बन जाता है वहीँ राजपूत समाज की यूपी में भी संख्या कम होने के बावजूद भी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सीएम बन जाते हैं.वहीं राजस्थान में भाजपा ने भैरोसिंह शेखावत को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया

यूपी में भी भाजपा ने पहले एक बार राजनाथ सिंह को मुख्यमंत्री बनाया.इसलिए जाट कभी कभार पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जाटलैंड के नाम पर अलग राज्य बनवाने का आन्दोलन भी चलाते रहे हैं..अब लौटते हैं पहलवानों के मुद्दे पर पहलवानों का मुद्दा खत्म होने के बाद जाटलैंड का आन्दोलन भी कभी भी जोर पकड़ सकता है.जाटों की सत्ता पर एकछत्र पकड़ छूटने की बड़ी वजह यह है कि हरियाणा हो, राजस्थान हो या यूपी, जाट मोटे तौर पर हमेशा कांग्रेस के साथ ही रहा है

चौधरी चरण सिंह भी पहले कांग्रेस में ही थे.वह कांग्रेस से बाहर आ कर ही यूपी मुख्यमंत्री बन पाए थे.दूसरी तरफ राजस्थान हो या हरियाणा या यूपी, राजपूत हमेशा से ही भाजपा के साथ ही रहा है.यूपी में अभी भी 18 राजपूत विधायक हैं, और सभी बीजेपी से हैं|बड़ा सवाल यह है की जाट समाज को कांग्रेस से यह पूछना चाहिए.कि उसने आज तक राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया? कांग्रेस के सापेक्ष बीजेपी को जब मौक़ा मिला जाट सीएम बनाया..भले ही वह दिल्ली में साहिब सिंह वर्मा हों, या राजस्थान में जाट परिवार की बहू वसुंधरा राजे

बहरहाल अभी तो जाटों का जंग ए मैदान हरियाणा बना हुआ है, लेकिन जल्द ही जंग ए मैदान हरियाणा से राजस्थान शिफ्ट हो जाएगा..अगर जाट आन्दोलन के कारण हनुमान बेनीवाल की इतनी सीटें ले आए कि उनके बिना कांग्रेस या भाजपा को राजस्थान में सरकार बनाना मुश्किल हुआ, तो शर्त एक ही होगी जाट मुख्यमंत्री बने.पूर्व राज्यपाल और यूपी के जाट नेता सतपाल मलिक राजस्थान में बड़े ही एग्रेसिव ढंग से भाजपा के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने भी कहा है कि अगर भाजपा वसुंधरा राजे को प्रोजेक्ट कर देती हैं, तो भाजपा जीत मिल सकती है.मलिक भी जाट पहलवान आन्दोलन और जाट किसान आन्दोलन का हिस्सा हैं| इसलिए उनका यह बयान जाटों की रणनीति का खुलासा करने वाला माना जा सकता है।

Rajasthan Politics: Vasundhara Raje का राजनीतिक अज्ञातवास

पूर्व सीएम वसुंधरा राजे जन्म से जाट नहीं हैं, लेकिन उनका मामला बिलकुल अलग है.सिंधिया राज घराने की वसुंधरा राजे की मां नेपाल के राजपरिवार से थीं.वसुंधरा की शादी धौलपुर के जाट राजघराने में हुई थी.हालांकि राजस्थान के राजपूत वसुंधरा राजे के पिता जीवाजी राव सिंधिया को राजपूत नहीं मानते, लेकिन एक राजपूत मां की बेटी होने के नाते, राजपूत उन्हें स्वीकार करते हैं तो वहीं जाट उन्हें अपनी बहू मान कर भी स्वीकार करते हैं| तो वहीं राजस्थान में अच्छा खासा प्रभाव रखने वाले गुर्जर समाज भी उन्हें अपनी समधन मान कर स्वीकार करते हैं, क्योंकि वसुंधरा बेटे दुष्यंत सिंह की शादी गुर्जर परिवार में हुई है.जाटों की दूसरी सबसे पीड़ा यह है कि रेसलिंग में सबसे ज्यादा मेडल जाट पहलवान लाते हैं, लेकिन रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष राजपूत है.इसलिए जाट समाज का लक्ष्य राजस्थान में जाट सीएम बनवाने के साथ रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष पद भी राजपूत से भी छीनना है..पहलवानों की तरफ से यह फीलर भी फेंका गया कि अगर कांग्रेस के नेता दीपेन्द्र सिंह हुड्डा स्वीकार्य नहीं हैं, तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ओपी धनखड़ को रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष बना दीजिए, लेकिन पहलवान चाहते जाट ही हैं..

जबकि कुश्ती संघ का चुनाव किसी के दबाव में नहीं बल्कि फेडरेशन के नियमों के मुताबिक़ होगा....फेडरेशन के जो 54 वोटर हैं, उन्हीं में से अध्यक्ष चुना जाएगा सीएम की कुर्सी हो या रेसलिंग फेडरेशन का अध्यक्ष पद, सभी समुदायों को साथ लेकर चलना पड़ता है| जाटों में यह खुलापन होता तो पहलवानों का आन्दोलन सिर्फ जाट पहलवानों का आन्दोलन बन कर नहीं रहता

बहरहाल जनवरी में जब से आन्दोलन शुरू हुआ था, तो दूसरे राज्यों से भी पहलवानों का समर्थन मिला था, लेकिन जल्द ही यह बात उजागर हो गई कि यह जाटों की कुर्सी की लड़ाई है, तो उन्होंने पैर पीछे खींच लिया है..हरियाणा के जाट पहलवान उन्हें आन्दोलन में भी साथ लेकर नहीं चल पाए..जाटों में सबको साथ लेने की कला होती तो हरियाणा में सभी जातियां उनके खिलाफ लामबंद नहीं होती, जैसे अब हो गई हैं, और सबने मिलकर उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया है।