Shukrawar Upay: शुक्रवार की रात करें ये गुप्त टोटका होगी मां लक्ष्मी की कृपा, जानें पूरी विधि
हिंदू धर्म में सप्ताह के हर वार का अपना अलग ही महत्व होता है। वहीं शुक्रवार का दिन माता लक्ष्मी का वार माना जाता है और कहा जाता है कि इस दिन अगर मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करनी है तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। लक्ष्मी को खुश करने के लिए लोग शुक्रवार का व्रत भी रखते हैं लेकिन इसके बाद भी उन पर लक्ष्मी की कृपा नहीं होती है। लेकिन हम आपको एक ऐसा उपाय बताने जा रहे है जिसके करने से आपके घर में कभी भी पैसों की कमी नहीं आएगी और दरिद्रता का हमेशा के लिए नाश हो जाएगा। सब को पता है धन और वैभव में वृद्धि माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से ही होगी।
पहले आप को व्रत करना होगा। इसके बाद शुक्रवार की रात में लगभग 9 से 11 के मध्य रात में स्नान करें या स्वयं को गंगाजल से पवित्र करके साफ वस्त्र धारण करके एक चौकी पर बैठ जाए। इसके बाद अपने सामने माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की मूर्ति को स्थापित करके जल से भरा हुआ एक कलश रख। इसके बाद एक लाल कपड़ा उनके आगे रख दें और अगरबती जला दें। इसके बाद फूल, चंदन, कुमकुम, धूप, दीप, फल, और मिठाई अर्पित करके पूजन करना शुरू कर दें। इसके बाद अंत में आपको दोनों की आरती का जाप करना होगा और मन में जो भी उसको सच्चे दिल से मांगें।
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इसके साथ ही आपको एक ऐसे मंत्र का उचारण करना होगा जो आपकी जीवन से दरिद्रता को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।
ॐ नारायणः परम् ज्योतिरित्यन्गुष्ठाभ्यनमः
ॐ नारायणःपरम् ब्रह्मेति तर्जनीभ्यानमः
ॐ नारायणः परो देव इति मध्य्माभ्यान्मः
इस मंत्र का लगातार जाप करने से आपके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आना शुरू हो जाएगा।
न में त्वदन्यःसंत्राता त्वदन्यम् न हि दैवतं।
त्वदन्यम् न हि जानामि पालकम पुण्यरूपकं।।
यावत सान्सारिको भावो नमस्ते भावनात्मने।
तत्सिद्दिदो भवेत् सद्यः सर्वथा सर्वदा विभो।।
पापिनामहमेकाग्यों दयालूनाम् त्वमग्रणी।
दयनीयो मदन्योस्ति तव कोत्र जगत्त्रये।।
त्वयाप्यहम न सृष्टश्चेन्न स्यात्तव दयालुता।
आमयो वा न सृष्टश्चेदौषध्स्य वृथोदयः।।
पापसङघपरिक्रांतः पापात्मा पापरूपधृक।
त्वदन्यः कोत्र पापेभ्यस्त्राता में जगतीतले।।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव,त्वमेव बन्धुश्च सखात्वमेव।
त्वमेव विद्या च गुरस्त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव।।
प्रार्थनादशकं चैव मूलाष्टकमथापि वा।
यः पठेतशुणुयानित्यं तस्य लक्ष्मीःस्थिरा भवेत्।।
नारायणस्य हृदयं सर्वाभीष्टफलप्रदं।
लक्ष्मीहृदयकंस्तोत्रं यदि चैतद् विनाशकृत।।
तत्सर्वं निश्फ़लम् प्रोक्तं लक्ष्मीः क्रुधयति सर्वतः।
एतत् संकलितं स्तोत्रं सर्वाभीष्ट फ़ल् प्रदम्।।
लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं तथा नारायणात्मकं।
जपेद् यः संकलिकृत्य सर्वाभीष्टमवाप्नुयात।।
नारायणस्य हृदयमादौ जपत्वा ततः पुरम्।
लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं जपेन्नारायणं पुनः।।
पुनर्नारायणं जपत्वा पुनर्लक्ष्मीहृदं जपेत्।
पुनर्नारायणंहृदं संपुष्टिकरणं जपेत्।।
एवं मध्ये द्विवारेण जपेलक्ष्मीहृदं हि तत्।
लक्ष्मीहृदयकं स्तोत्रं सर्वमेतत् प्रकाशितं।।
तद्वज्ज पादिकं कुर्यादेतत् संकलितं शुभम्।
स सर्वकाममाप्नोति आधि-व्याधि-भयं हरेत्।।
गोप्यमेतत् सदा कुर्यान्न सर्वत्र प्रकाशयेत्।
इति गुह्यतमं शास्त्रंमुक्तं ब्रह्मादिकैःपुरा।।
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तस्मात् सर्व प्रयत्नेन गोपयेत् साधयेत् सुधीः।
यत्रैतत् पुस्तकं तिष्ठेल्लक्ष्मिनारायणात्मकं।।
भूत-प्रेत-पिशाचान्श्च वेतालन्नाश्येत् सदा।
लक्ष्मीहृदयप्रोक्तेन विधिना साधयेत् सुधीः।।
भृगुवारै च रात्रौ तु पूजयेत् पुस्तकद्वयं।
सर्वदा सर्वथा सत्यं गोपयेत् साधयेत् सुधीः।।
गोपनात् साधनाल्लोके धन्यो भवति तत्ववित्।
नारायणहृदं नित्यं नारायण नमोsस्तुते।।

