गहलोत को राजनीति का सबसे बड़ा जादूगर माना जाता है और उन्होंने इस बात को कई बार साबित करके भी दिखाया है। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद मंत्री बनने से वंचित रह गये विधायकों की नाराजगी के डर के चलते राजनीतिक नियुक्तियां  देने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। इसकी पहली झलख रविवार रात को छह विधायकों को सीएम अशोक गहलोत का सलाहकार नियुक्त करने से शुरू हो गयी है। लेकिन राजनीति के इतने बड़े खिलाड़ी को आखिरकार ऐसी किस सलाह की जरूरत पड़ेगी जिसके लिए 6 विधायकों को सहालकार बनाया गया है। 
अशोक गहलोत का राजनीतिक सफर
पहली बार ऐसा हुआ है कि राजनीति के जादूगर को भी 6 सलाहकार चुनने पड़े हैं। सीएम गहलोत के राजनीति जीवन की बात करें तो वह सबसे पहले 1980 में 7वीं लोकसभा के लिए जोधपुर संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए और उसके बाद 8वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं लोकसभा पहुंचे इस दौरान इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी और पी.वी.नरसिम्हा राव के मंत्रीमण्डल में कार्य किया। इसके बाद गहलोत 1999, 2003, 2008, 2013 और 2018 में जोधपुर शहर के सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए है।  गहलोत 1998 से  2003 तक पहली बार, 2008 से 2013 तक दूसरी और दिसम्बर 2018 को तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली है।

पायलट बगावत से गहलोत को लगा झटका
पायलट गुट की नाराजगी के चलते गहलोत सरकार पर खतरा मंड़राने लगा तो गहलोत ने निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में लाने में सफल हुए। लेकिन उनको इस बार भी मंत्री नहीं बना सके लेकिन उनको सीएम का सलाहकार बनाकर अपना वादा तो पूरा किया है। लेकिन राजनीति के जानकारों की मानें तो यह गहलोत की मजबूरी है कि उनके पास राजनीति का इतना अनुभव है कि शायद इन विधायकों के पास उनको सलाह देने के लिए कुछ भी नहीं है। 

गहलोत के सलाहकार बनाये गये 6 विधायकों में खेतड़ी विधायक डॉ जितेंद्र सिंह, नवलगढ़ विधायक डॉ. राजकुमार शर्मा, सवाई माधोपुर विधायक दानिश अबरार समेत निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा, बाबूलाल नागर और रामकेश मीणा है। सीएम गहलोत ने संकट के समय जिन लोगों ने 34 दिन हमारे साथ होटल में गुजारे थे हम उन्हें कभी नहीं भुल सकते। इन विधायकों के समर्थन के कारण ही गहलोत सरकार का संकट टला था और गहलोत ने समय आने पर इनको ब्याज सहित इसकी भरपाई करने की बात भी कही थी।
विभागों का बटवारा
पायलट—गहलोत गुट की जंग को शांत करने के लिए फेरबदल तो हो गया और पायलट कैम्प के विधायकों को शामिल कर लिया। लेकिन असली जंग तो विभागों के बटवारे के बाद होगी अगर इस बार विभागों का बटवार सही से नहीं होता है तो एक बार इन दोनों गुटों में जंग देखने को मिल सकती है। पायलट ने जब बगावत की तो इसी आधार पर कि थी कि उनकी सुनवाई नहीं होती कई विभाग तो उनके कामों को करने से मना कर देते हैं। इस बार गृह विभाग के साथ वित्त विभाग की जिम्मेदारी किसे मिलती है यह भी देखने की बात होगी।