मणिपुर पिछले काफी दिनों से हिंसा की आग में सुलग रहा है। जातीय हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट, हत्या...हालात बेहद भयावह हैं.मणिपुर में बड़ी तादाद में आर्मी और असम राइफल्स के जवानों को तैनात किया गया है.लेकिन सवाल ये उठता है की आखिर ऐसी स्थिति आई क्यों..और क्यों सुलग रहा है मणिपुर ?
बता दें की मणिपुर में हिंसा का लंबा इतिहास रहा है.इस इतिहास में उसके भूगोल की भी अपनी भूमिका है.उसके अलावा वहां के सामाजिक ताने-बाने, बुनावट को समझे बगैर, मौजूदा हिंसा की वजह भी नहीं समझी जा सकती है.तो आइए इतिहास, भूगोल और सामाजिक ताने-बाने के आईने में मणिपुर में चल रही हिंसा की वजह को समझते हैं.
दरअसल मणिपुर हिंसा जब शुरू हुई तो कर्नाटक चुनावों का दौर था और उस क्षेत्र में बीजेपी का ही शासन था.ऐसे में उस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई.लेकिन चुप्पी साधना किसी समस्या का हल तो होता नहीं है.हिंसा थमी नहीं, जारी है.इसी बुधवार को पूर्वी इम्फाल के खामलांक इलाके में नौ लोगों की हत्या कर दी गई, जबकि दस लोग बुरी तरह से घायल हो गये..इसी तरह केन्द्रीय मंत्री के आवास पर पेट्रोल बम से हमले के बाद, शनिवार को मणिपुर भाजपा अध्यक्ष ए शारदा देवी के घर पर दंगाई हमला करने पहुंच गये.स्वाभाविक है की मणिपुर हिंसा की आग में जल रहा है,और इस आग को बुझने भी नहीं दिया जा रहा है.
इस हिंसा का कारण उस कानून में फेरबदल की संभावना को बताया जा रहा है, जिसके तहत जनजातीय क्षेत्रों में उनके संरक्षण के प्रावधान किये गये हैं.इसीलिए जिन क्षेत्रों में जनजातीय आबादी है, उन क्षेत्रों लिए कानून बनाने से हमारी सरकारें करीब सात दशकों से हिचकिचाती रही हैं.इसमें जमीन का मुद्दा, एक बड़ा मुद्दा है..भारत के किसी भी नागरिक को संवैधानिक रूप से भारत के किसी भी हिस्से में जाकर बसने की स्वतंत्रता तो है, लेकिन जनजातीय क्षेत्रों में, पहाड़ी इलाकों में, ये स्वतंत्रता लागू नहीं होती है।
आदिवासी समुदायों की आबादी वाले क्षेत्रों की समस्याओं की बात शुरू होते ही, फिर से कई साल पुरानी एक बेहद ही गंभीर समस्या सहज ही याद आ जाती है.इस समस्या को "डीलिस्टिंग" कहा जाता है..ढेबर कमीशन जनजातीय क्षेत्र और जनजातियों के लिए बना पहला कमीशन था,, जिसने अपनी रिपोर्ट 1960-61 में सौंपी थी..इस कमीशन ने अनुसूचित क्षेत्रों का निर्धारण करने के लिए चार मापदंड के सुझाव दिए थे..इनमें से तीन तो क्षेत्र के आकार और विकास से सम्बंधित थे, लेकिन चौथा जनसंख्या पर आधारित था.
चौथा मापदंड यह कहता था कि, जहाँ जनजातियों की आबादी कम से कम पचास प्रतिशत हो,,उसे ही जनजातीय क्षेत्र घोषित किया जा सकता है..इसी को करीब पचास वर्ष बाद,2013 में जनजाति मामलों के मंत्रालय ने भी माना और अपनी रिपोर्ट में कहा कि ब्लॉक यानी प्रखंड या जिला तभी जनजातीय क्षेत्र घोषित होगा जहां जनजातीय आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा हो.अब बड़ा सवाल उठता है की इससे फर्क क्या पड़ता है?...अंतर आप मणिपुर में देख सकते है.
नागा और कुकी की आबादी वाले क्षेत्रों को जनजातीय क्षेत्र मानकर, दूसरों का वहाँ जमीन खरीदना बिलकुल मना है..किन्तु मैतेई जो उनसे पहले से मणिपुर में रहते हैं, उन्हें जनजाति माना ही नहीं जाता, इसलिए वो नागा-कुकी की आबादी वाले क्षेत्रों में जमीनें नहीं खरीद सकते..मैतेई लोगों को जनजातियों में शामिल करने की बात वो बहाना था, जिस पर हाल ही में मणिपुर में दो बार हिंसा भड़की और गृहमंत्री की चेतावनी के बाद सैकड़ों की संख्या में हथियार थानों में डाले गये..अभी इससे पहले जिस डीलिस्टिंग की बात हो रही थी,इसकी नींव वर्तमान झारखण्ड के लोहरदग्गा से सांसद रहे कार्तिक उराँव ने डाली थी.ब्रिटिश शासित भारत में 28 अक्टूबर 1924 को जन्मे कार्तिक उराँव तीन बार लोहरदग्गा से सांसद रहे और केंद्र में विमानन एवं संचार मंत्री भी रहे थे.
कुरुख समुदाय से आने वाले कार्तिक उराँव का सबसे बड़ाकाम था, डीलिस्टिंग आन्दोलन की बुनियाद डालना..उराँव ने1960 के दौर में डीलिस्टिंग आन्दोलन की नींव रखी थी..झारखण्ड के जनजातीय समाज में पूज्य माने जाने वाले बिरसा मुंडा के आन्दोलन के ही उन्होंने एक तरह से आगे बढ़ाया था..जैसा कि जानते हैं की, बचपन में इसाई बना दिए गए बिरसा मुंडा ने "घरवापसी" कर ली थी और उसके बाद से जनजातीय क्षेत्रों में उन्होंने मिशनरी और ब्रिटिश घुसपैठ व हस्तक्षेप के विरुद्ध संघर्ष किया था..सांसद कार्तिक उराँव ने भी अनुसूचित जनजाति आदेश संशोधन विधेयक 1967 में ऐसी ही बात की थी..इस विधेयक का मुख्य बिंदु ये था कि, जिस व्यक्ति जनजातीय आदिमत तथा विश्वासों को परित्याग कर दिया हो और ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया हो, वह अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं समझा जायेगा..अपनी बात के समर्थन में उन्होंने 322 लोकसभा सांसदों और 26 राज्यसभा के सांसदों का समर्थन भी जुटा लिया था.कार्तिक उराँव का विधेयक कभी कानून नहीं बन पाया.राजनीति का शिकार हुआ ये विधेयक इतिहास और अदालती बहसों का विषय हो गया.
Manipur violence: मणिपुर में नहीं थम रही हिंसा की आग
अगर हम सीधे संविधान की बात करें तो इस तरह अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने के लिए अधिकतम या न्यूनतम जनजाति आबादी का प्रावधान, संविधान में है ही नहीं..ढेबर कमीशन की रिपोर्ट हो या बाद में आये इसी तरह के अन्य कमीशनों की रिपोर्ट,, ये सभी मात्र मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह है.अदालती मामलों में सिर्फ इनके आधार पर कोई फैसला आये ये भी संभव नहीं है..इसलिए यहाँ सोच-विचारकर बनाये गए एक कानून की आवश्यकता है..अगर सिर्फ 50 प्रतिशत जनजाति आबादी की बात करें तो ये मापदण्ड व्यावहारिक नहीं हो सकता है..झारखण्ड, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड सहित कई राज्यों में इस तरह के किसी नियम का क्या परिणाम हो सकता है, उसका नमूना हम लोग रेलवे की भूमि पर से उत्तराखंड में एक अतिक्रमण हटाने के मामले में हाल ही में देख चुके हैं..
आबादी का अनुपात बदलकर चुनावों तक को प्रभावित कर देने में कुछ लोग समर्थ हो चुके हैं..यही हाल बिहार के कम से कम तीन जिलों- पूर्णियां, अररिया, और किशनगंज का हो चुका है..अनगिनत विधानसभा क्षेत्रों में भी बांग्लादेशी घुसपैठ और कश्मीर तक रोहिंगिया घुसपैठियों की वजह से उत्तर-पूर्वी राज्यों और बंगाल में भी ऐसी ही स्थिति है..जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन और कानून की भी अलग व्यवस्था होती है..ऐसा पेसा आधिनियम 1996 के जरिये होता है. पेसा कानून धारा 4 (अ) के मुताबिक ऐसी पंचायतों के बारे में कानून बनाते समय राज्य सरकारें, रूढ़िगत विधि, सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और समुदाय के संसाधनों की परम्परागत पद्धतियों को मान्यता देगा, या उसके अनुरूप कानून बनायेगा।
अब सवाल ये है कि धर्मान्तरण और मिशनरी स्कूलों में सिखाये हुए नए रीति-रिवाजों की वजह से कई नियम-कायदे तो बदल चुके हैं! धर्मांतरण के कारण जनजाति समूह अपनी मूल धार्मिक, सांस्कृतिक व परम्परागत मान्यताओं को छोड़ रहे हैं.इसी समय धर्मान्तरण को वो सरकारी कागजों पर घोषित नहीं करते,, ताकि आरक्षण सहित सभी सरकारी लाभ को प्राप्त कर सकें..इन सबके बीच अगर सरकार द्वारा कानून लाने की कोशिश की जाये तो पूरी संभावना है कि नतीजे वही होंगे जो हाल में नये कृषि सम्बन्धी कानूनों का हुआ था.
बहरहाल मणिपुर की सुलगती आग को तभी ठंडा किया जा सकता है जब सरकारें सभी समुदायों को विश्वास में लेकर आगे की रणनीति पर बात करे.अधिकारों की मांग को लेकर हथियार उठाने का चलन पहली बार इस देश ने नही देखा है..जाहिर सी बात एक हद तक दिए गए दबाव के बाद सिर्फ बातचीत के जरिए ही अंतिम रास्ता तय होता है..ऐसे में चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार दोनो को ही इस मामले में राजनीतिक वोटबैकं को दरकिनार कर समस्या के समाधान पर काम करना होगा.
