Monday, 5 October 2026
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Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी पर कैसे करें भगवान विष्णु की पूजा? जानें सभी जरूरी नियम

संक्षेप में

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है, जिससे चार महीने के चातुर्मास का आरंभ होता है और भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार राजा मांधाता ने अकाल दूर करने के लिए यह व्रत किया था। इस दिन पीले वस्त्र पहनकर विष्णु पूजा की जाती है और पंढरपुर में भव्य आयोजन होता है।

मुख्य बातें

  • देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं।
  • इस तिथि के साथ ही चातुर्मास का आरंभ होता है और सभी मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं।
  • व्रत के महात्म्य का वर्णन भविष्योत्तर पुराण में राजा मांधाता की कथा के रूप में मिलता है।
धर्म
Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी पर कैसे करें भगवान विष्णु की पूजा? जानें सभी जरूरी नियम

देवशयनी एकादशी 2026: चातुर्मास का आरंभ और भगवान विष्णु की योगनिद्रा, जानें पूजा के नियम और कथा

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की तिथि पर मनाई जाती है, जिसके साथ ही चार महीने के चातुर्मास का आरंभ होता है। इस वर्ष 2026 में देवशयनी एकादशी के अवसर पर देश भर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष अनुष्ठान की तैयारी है। इस तिथि पर भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसे चातुर्मास या पावसामुस कहा जाता है। इस चार महीने की अवधि में विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के शयन काल में जाने के बाद सृष्टि के संचालन का दायित्व भगवान शिव और अन्य देवगणों के पास रहता है। देवशयनी एकादशी को आषाढ़ शुक्ल एकादशी या पद्मनाभा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस अवधि में साधक और श्रद्धालु आत्मिक शुद्धि, संयम और विशेष व्रतों का पालन करते हैं। चातुर्मास का यह काल कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान के जागने के साथ संपन्न होता है।

भविष्योत्तर पुराण में वर्णित कथा और अकाल निवारण

इस व्रत के महात्म्य और ऐतिहासिक प्रसंग का विस्तृत वर्णन भविष्योत्तर पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार, प्राचीन काल में सूर्यवंश के प्रतापी राजा मांधाता के राज्य में लगातार तीन वर्षों तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ गया था। इस आपदा से अन्न की कमी हो गई और प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। प्रजा की इस पीड़ा और संकट को दूर करने के उपाय की तलाश में राजा मांधाता अकेले ही वन की ओर निकल पड़े।

भ्रमण करते हुए राजा की भेंट महर्षि अंगिरा से हुई, जिन्होंने राजा को पूरी व्यथा सुनने के बाद आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने की सलाह दी। ऋषि अंगिरा ने बताया कि इस एकादशी के प्रभाव से वरुण देव प्रसन्न होते हैं और राज्य में पुनः वर्षा का मार्ग प्रशस्त होता है। राजा मांधाता ने अपनी प्रजा के साथ राजधानी लौटकर विधि-विधान से इस एकादशी का व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई, अकाल का संकट टला और पुनः सुख-समृद्धि लौट आई।

देवशयनी एकादशी व्रत के मुख्य नियम और पूजा पद्धति

व्रत के नियमों के मुताबिक, इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा करनी चाहिए। साधकों को इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनने, पूजा में पीले पुष्प, पीले फल और पीला नैवेद्य अर्पित करने का विधान है। इसके साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ और भगवान के पवित्र नामों का निरंतर जप करना फलदायी माना जाता है।

इस दिन कुछ विशेष वर्जित नियमों का पालन करना भी आवश्यक है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, एकादशी तिथि पर तुलसी के पत्ते न तोड़ने और पौधे पर जल न चढ़ाने के नियम बताए गए हैं, क्योंकि तुलसी माता इस दिन व्रत रखती हैं। व्रत का पारण द्वादशी तिथि के दिन शुभ मुहूर्त में अन्न और सात्विक प्रसाद ग्रहण करके किया जाता है। रात्रि के समय भगवान के भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करना इस व्रत का प्रमुख अंग माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

देवशयनी एकादशी कब मनाई जाती है?

देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की तिथि पर मनाई जाती है, जिससे चातुर्मास का आरंभ होता है।

देवशयनी एकादशी के दिन कौन से कार्य वर्जित होते हैं?

इस तिथि के बाद भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसके कारण विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे सभी शुभ कार्य चार महीने तक वर्जित रहते हैं।

देवशयनी एकादशी व्रत की कथा किस ग्रंथ में मिलती है?

इस व्रत के महात्म्य और राजा मांधाता की कथा का वर्णन भविष्योत्तर पुराण में मिलता है, जिसमें अकाल निवारण के लिए इस व्रत का विधान बताया गया है।