Monday, 5 October 2026
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यहां खेली जाती है श्मशान की राख से होली,जानें इस प्राचीन मान्यता का सच

धर्म
यहां खेली जाती है श्मशान की राख से होली,जानें इस प्राचीन मान्यता का सच

होली का त्योहार इस बार 17 मार्च को बड़ी धूमधाम से मनाने की तैयारी चल रही है। इस पर्व को मनाने के पीछे भी एक प्राचीन कहानी है जिसके कारण इस पर्व को मनाने की शुरूआत हुई थी। होली के दिन लोग एक दूसरे को रंग लगाकर इस त्योहार को मनाते है। लेकिन इस पर्व को सबसे ज्यादा कृष्ण नगरी कही जाने वाली मथुरा, वृंदावन, बरसाना में बहुत ही ज्यादा मनाया जाता है।

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इस पर्व की शुरूआत होली रंगभरी एकादशी से शुरू हो जाती है और काशी में सबसे पहले काशीवासी अपने ईष्ट भोले बाबा के साथ महाश्मशान पर चिता भष्म से होली खेलकर इसकी शुरूआत करते हैं। इसके बाद होली की शुरुआत अन्य जगहों पर होती है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन महाश्मशान पर होली का कारण बहुत ही मजेदार है।

रंगभरी एकादशी के दिन भगवान विश्वनाथ मां पार्वती का गौना कराकर काशी पहुंचकर होली खेली थी। लेकिन श्मशान पर बसने वाले भूत, प्रेत, पिशाच और अघोरी के साथ वे होली नहीं खेल पाए थे और रंगभरी एकादशी के दिन विश्वनाथ इन्हे के साथ चिता-भस्म की होली खेलने महाश्मशान में आते है।

 

रंगभरी एकादशी के दिन महाश्मशान नाथ की पूजा और आरती होती है और इसके बाद वह चिताभस्म से होली खेलते है। महाश्मशान में चिता की आग ठंडी नहीं होती क्योंकि वहां चौबीसों घंटें चिताएं जलती रहती है। प्राचीन मान्यता के कारण ही भस्म से होली खेली जाती है।