शिक्षक से शुरू हुआ द्रौपदी कर सफर अब राष्ट्रपति तक पहुंचा, जानें संघर्ष की पूरी कहानी
राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए एनडीए ने द्रौपदी मुर्मू के नाम पर मुहर लगाई है। मुर्मू एक आदिवासी चेहरा है जो पहली बार राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया है और अगर द्रौपदी मुर्मू ये चुनाव जीत जाती हैं तो भारत के इतिहास में पहली बार आदिवासी राष्ट्रपति बनेगा।
नरेंद्र मोदी ने द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाकर फिर एक बार चौंका दिया है और इससे पार्टी ने आदिवासियों को साधने के साथ महिलाओं का भी ध्यान रखा है। भारत की जनसंख्या का लगभग 8 फीसदी यानी लगभग 11 करोड़ की जनसंख्या आदिवासियों की है लेकिन इसके बाद उनको नजरंदाज किया जाता रहा है।
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द्रौपदी मुर्मू ही देश की अगली राष्ट्रपति होंगी क्योंकि विपक्ष के कई बड़े दल इनके नाम का विरोधा नहीं कर सकेंगे और अगर ऐसा करते है तो वह आदिवासी वोट बैंक उनके हाथ से निकल जाएगा। द्रौपदी ओडिशा के मयूरभंज के अपने गांव माहूलडिहा में अपने घर में रहती है।
द्रौपदी आदिवासी संथाल समाज से आती हैं और उनका पपरिवार बहुत गरीब है। नौकरी के साथ बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना शुरू किया और समाजसेवा को कभी नहीं छोड़ा। 1997 में उन्होंने पहली बार रायरंगपुर नगर पंचायत के काउंसलर के पद पर जीत हासिल की और 2000 में उन्हें विधायक का टिकट मिला और वे यह चुनाव भी जीत गई।
इसके बाद उनके जीवन में बहुत बड़ी परेशानी आई और दोनों बेटों की मौत हो गई और पति भी चल बसे लेकिन वह हारी नहीं। हिम्मत जुटाकर उन्होंने समाजसेवा करना शुरू कर दिया। इसके बाद वह राज्यपाल के पद पर आसीन रही और अब वह देश के सबसे बड़े पद राष्ट्रपति बनने की तरफ बढ़ रही है। राष्ट्रपति उम्मीदवार चुने जाने के बाद द्रौपदी को केंद्र की तरफ से Z+ सिक्योरिटी दी गई है।

कभी एनडीए सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे यशवंत सिन्हा को विपक्ष ने राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया है और अब उनका मुकाबला NDA उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू से होगा। लेकिन द्रौपदी के नाम के ऐलान के बाद से विपक्ष ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया है और लग रहा है इस बार देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिलेगी।

